एक नए ज़माने की अधूरी कहानी


यह कहते हुए की यह कौन-सी कहानी है, और इसका नाम किस प्रकार से रखा गया, क्या इसके पीछे की  कहानी है।  क्योकि बहुत लोग हैं जो संवेदनशील हैं, भावुक हैं दुसरो के प्रति, ईमानदार हैं और अंदर से जोश भी भरा हुआ है की कुछ करें पर अपने इस उदारता के वजह और कई तरह के सोंच की बड़ी वजह से कुछ न कर पाते। यह  कहानी  किसी को हिदायत नहीं देती पर इतना तो ज़रूर कर देती है की लोग यह सोंचते है की कहीं न कहीं यह बात सही है" और यही मेरे लिए काफी है, किस तरह से हमें खुद को बदलना है, सुधारना है. बस इतना समझ जाओ की हम अपनी भावुकता अपने हर उन चीज़ों में जहां उसको बचाये रखनी है, में दखल कर देते हैं और जब हमारा काम नहीं बनता तो दोष भी खुद को दे डालते हैं. आंकड़े भी मौजूद हैं. आनेवाले क्षणिक भर की ख़ुशी के लिए हम थोड़ा सा उधार ले लेते हैं और सोंचते है की थोड़े थोड़े कर के इसे पूरी कर देंगे सूद के साथ लेकिन जब चुकाने का पहला वक्त आता हैं तो समझ आती हैं, अरे हमारे निश्चित आय से एक टुकड़ा उस उधार को चुकाने में जानेवाला है और फिर क्या चले आते हैं मायूसी के अँधेरे मैं जहां गम के बादल घिर आते हैं और इस तरह की चोट कितने दिन लगेगी और कितनी बार हमारी बेकद्री होगी खुद से हमें अंदाजा नहीं। हम उसी उधार को चुकाने के लिए फिर से उधार लेते हैं और ठीक यही से शुरू ह जाती हैं हमारे जीवन की असली बेकद्री। संयोग का वह रूप तो देखिये की जब तक हमारे अर्जन का श्रोत है किसी भी प्रकार से पूरी करने की कोशिश करते रहते हैं पर डर इस बात का भी रहता है की जीविकोपार्जन बना रहे और हम यूँही भरते रहे अगर किसी दिन हमारे हाथो से अर्जन का वह स्रोत चला गया तो न सिर्फ हम खुद बल्कि हम लेनदार के नज़र में भी बर्बाद हो जाते हैं और यकीं मानिये उस समय कोई भी सहारा नहीं होता सिवाए किस्मत का. सब इंसान अमीरी और रइस या फिर किसी पैदाइसी दौलतमंद के घर पैदा नहीं होते जहां थोड़े क्या लाखों की भी इज़्ज़त नहीं की जाती और वे इस बात से निश्चिंत रहते हैं की हमारे पास इतना है की कितना भी खर्च कर ले शायद इस जनम में तो ख़तम नहीं होगा, दूसरा ये भी है की अगर हम मानते हैं की हमने कोई व्यवसाय भी किया तो किस बात की गारंटी है की वो चलेगा ही और जनाब व्यवसाय तो अपने पीछे एक मजबूत हाथ भी मांगता हैं ताकि अगर कहीं वो लड़खड़ा जाए तो वो मजबूत हाथ चाहे वो हमारा बैकग्राउंड का पैसा हो या किसी अपनों का साथ वो हमें संभाल लेगा। अव्वल तो हमारे रिश्तेदार तो ऐसे समय में भाग खड़े होते हैं. 

इस अधूरी कहानी की सारांश बस यही हैं की उपयुक्त जो भी बातें हैं वो सिर्फ हमें आगाह करती हैं की अब तक जो भी हुआ बस उसके पीछे हमारी भावुकता और हमारा संवेदनशीलता ही है. कठोर इंसान कभी शिथिल नहीं होता और उसे पता है हम कैसे करें और संकट के समय कैसे किनारे कर ले अपने आप को बुरी दुसंगतियों से. 

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